Wednesday, July 6, 2016

Gurjar Pratihar Rajput architecture and temples -

  • Rajput Kingdom started by Pratihar Kings. Gurjar name came from Gujrat and Pratihar are current Parihar Rajput. 
  • Fort, Fortresses, Temples, Art & Monuments built by Veer Gurjars

Saturday, April 23, 2016

Ancient Baphuon Shiva Temple from Cambodia

Ancient Baphuon Shiva Temple from Cambodia
Dated: ~11th century CE
It is a three-tiered temple mountain built as the state temple of Udayadityavarman II dedicated to the Hindu God Shiva. It is the archetype of the Baphuon style. The temple adjoins the southern enclosure of the royal palace and measures 120 metres east-west by 100 metres north-south at its base and stands 34 meters tall without its tower, which would have made it roughly 50 meters tall. Its appearance apparently impressed Emperor Chengzong of Yuan China's late 13th century envoy Chou Ta-Kuan during his visit from 1296 to 1297, who said it was 'the Tower of Bronze...a truly astonishing spectacle, with more than ten chambers at its base.'

Friday, April 22, 2016

राजस्थान का खजुराहो जो है 900 सालो से वीरान ! किराडू मंदिर


किराडू राजस्थान के बाड़मेर जिले में  स्थित है। किराडू अपने मंदिरों कि शिल्प कला के लिया विख्यात है। इन मंदिरों का निर्माण 11  वि शताब्दी में हुआ था।  किराडू को राजस्थान का खजुराहों भी कहा जाता है। लेकिन किराडू को खजुराहो जैसी ख्याति नहीं मिल पाई क्योकि यह जगह पिछले 900 सालों से वीरान है और आज भी यहाँ पर दिन में कुछ चहल – पहल रहती है पर शाम होते ही यह जगह वीरान हो जाती है , सूर्यास्त के बाद यहाँ पर कोई भी नहीं रुकता है। राजस्थान के इतिहासकारों के अनुसार किराडू शहर अपने समय में सुख सुविधाओं से युक्त एक विकसित प्रदेश था।  दूसरे प्रदेशों के लोग यहाँ पर व्यपार करने आते थे। लेकिन 12  वि शताब्दी में, जब किराडू पर परमार वंश का राज था , यह शहर वीरान हो जाता है।  आखिर ऐसा क्यों होता है, इसकी कोई पुख्ता जानकारी तो इतिहास में उपलब्ध नहीं है पर इस को लेकर एक कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है।





किराडू पर है एक साधू का श्राप :-

कहते हैं इस शहर पर एक साधु का श्राप लगा हुआ है। करीब 900साल पहले परमार राजवंश यहां राज करता था। उन दिनों इस शहर में एक ज्ञानी साधु भी रहने आए थे। यहां पर कुछ दिन बिताने के बाद साधु देश भ्रमण पर निकले तो उन्होंने अपने साथियों को स्थानीय लोगों के सहारे छोड़ दिया।
एक दिन सारे शिष्य बीमार पड़ गए और बस एक कुम्हारिन को छोड़कर अन्य किसी भी व्यक्ति ने उनकी देखभाल नहीं की। साधु जब वापिस आए तो उन्हें यह सब देखकर बहुत क्रोध आया। साधु ने कहा कि जिस स्थान पर दया भाव ही नहीं है वहां मानवजाति को भी नहीं होना चाहिए। उन्होंने संपूर्ण नगरवासियों को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया। जिस कुम्हारिन ने उनके शिष्यों की सेवा की थी, साधु ने उसे शाम होने से पहले यहां से चले जाने को कहा और यह भी सचेत किया कि पीछे मुड़कर न देखे।
लेकिन कुछ दूर चलने के बाद कुम्हारिन ने पीछे मुड़कर देखा और वह भी पत्थर की बन गई। इस श्राप के बाद अगर शहर में शाम ढलने के पश्चात कोई रहता था तो  वह पत्थर का बन जाता था।  और यही कारण है कि यह शहर सूरज ढलने के साथ ही वीरान हो जाता है।

कुछ इतिहासकारो का मत है कि किराडू मुगलों के आक्रमण के कारण वीरान हुए , लेकिन इस प्रदेश में मुगलों का आक्रमण 14 वि शताब्दी में हुआ था और किराडू 12  वि शताब्दी में ही  वीरान हो गया था इसलिए इसके वीरान  होने के पीछे कोई और ही कारण है।
किराडू के मंदिरों का निर्माण किसने कराया इसकी भी कोई पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। हालाकि यहाँ पर 12 वि शताब्दी के तीन शिलालेख उपलब्ध है पर उन पर भी इनके निर्माण से सम्बंधित कोई जानकारी नहीं है। पहला शिलालेख विक्रम संवत 1209 माघ वदि 14 तदनुसार 24 जनवरी 1153 का  है जो कि गुजरात के चौलुक्य कुमार पाल के समय का है। दूसरा विक्रम संवत 1218, ईस्वी 1161 का है जिसमें परमार सिंधुराज से लेकर सोमेश्वर तक की वंशावली दी गई है और तीसरा यह विक्रम संवत 1235 का है जो गुजरात के चौलुक्य राजा भीमदेव द्वितीय के सामन्त चौहान मदन ब्रह्मदेव का है। इतिहासकारों का मत है कि किराडू के मंदिरों का निर्माण 11 वि शताब्दी में हुआ था तथा इनका निर्माण परमार वंश के राजा दुलशालराज और उनके वंशजो ने किया था।

किराडू में किसी समय पांच भव्य मंदिरों कि एक श्रंखला थी। पर 19 वि शताब्दी के प्रारम्भ में आये भूकम्प से इन मंदिरों को बहुत नुक्सान पहुंचा और दूसरा सदियों से वीरान रहने के कारण इनका ठीक से रख रखाव भी नहीं हो पाया। आज इन पांच मंदिरों में से केवल विष्णु मंदिर और सोमेश्वर मंदिर ही ठीक हालत में है।  सोमेश्वर मंदिर यहाँ का  सबसे बड़ा मंदिर है।  ऐसी मान्यता है कि विष्णु मंदिर से ही यहां के स्थापत्य कला की शुरुआत हुई थी और सोमेश्वर मंदिर को इस कला के उत्कर्ष का अंत माना जाता है।

किराडू के मंदिरों का शिल्प है अद्भुत : स्थापत्य कला के लिए मशहूर इन प्राचीन मंदिरों को देखकर ऐसा लगता है मानो शिल्प और सौंदर्य के किसी अचरज लोक में पहुंच गए हों। पत्थरों पर बनी कलाकृतियां अपनी अद्भुत और बेमिसाल अतीत की कहानियां कहती नजर आती हैं। खंडहरों में चारो ओर बने वास्तुशिल्प उस दौर के कारीगरों की कुशलता को पेश करती हैं।
नींव के पत्थर से लेकर छत के पत्थरों में कला का सौंदर्य पिरोया हुआ है। मंदिर के आलंबन में बने गजधर, अश्वधर और नरधर, नागपाश से समुद्र मंथन और स्वर्ण मृग का पीछा करते भगवान राम की बनी पत्थर की मूर्तियां ऐसे लगती हैं कि जैसे अभी बोल पड़ेगी। ऐसा लगता है मानो ये प्रतिमाएं शांत होकर भी आपको खुद के होने का एहसास करा रही है।
सोमेश्वर मंदिर भगवान् शिव को समर्पित है।  भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर की बनावट दर्शनीय है। अनेक खम्भों पर टिका यह मंदिर भीतर से दक्षिण के मीनाक्षी मंदिर की याद दिलाता है, तो इसका बाहरी आवरण खजुराहो के मंदिर का अहसास कराता है। काले व नीले पत्थर पर हाथी- घोड़े व अन्य आकृतियों की नक्काशी मंदिर की सुन्दरता में चार चांद लगाती है। मंदिर के भीतरी भाग में बना भगवान शिव का मंडप भी बेहतरीन है।
किराडू शृंखला का दूसरा मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। यह मंदिर सोमेश्वर मंदिर से छोटा है किन्तु स्थापत्य व कलात्मक दृष्टिï से काफी समृद्ध है। इसके अतिरिक्त किराडू के अन्य 3 मंदिर हालांकि खंडहर में तब्दील हो चुके हैं, लेकिन इनके दर्शन करना भी एक सुखद अनुभव है।यदि सरकार और पुरातत्व विभाग किराडू के विकास पर ध्यान दे तो यह जगह एक बेहतरीन पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो सकती है l


Thursday, April 14, 2016

जेजुरी मँदिर(Jejuri Temple),

जेजुरी मँदिर(Jejuri Temple), As the temple is on the hill, one has to climb almost 200 steps. Butthe climbing is not so tough and the wonderful view of Jejuri townis marvelous. One can easily see the view of Saswad and Dive Ghat if weather permits. One can enjoy number of ' Deep Mala ' ( Light Stands of Stones ) while climbing the hill. Jejuri is really popular for its old Deep Mala. The temple over the hill is pretty. Though a simple one, still looks beautiful. The temple can be divided into Mandap and Gabhara. The two bells and idols in the temple are good looking.
The idol of Khandoba in the temple is beautiful. Various weapons like Sword , Damaru and Paral are of historic remembrance.
 

Thursday, March 3, 2016

Ornate Shikhar of Kedareshwar Temple, Balligavi(Karnatak)

Ornate Shikhar of Kedareshwar Temple, Balligavi(Karnatak)
Dated: 11th century CE
The dome is the largest monolithic sculptural piece in the temple with ground surface area of about 2x2 meters and is called the "amalaka".
The superstructures over the shrines are 3-tiered (tritala arpita) vesara (combination of south and north Indian style) with the sculptural details being repeated in each tier. The temple exhibits other standard features present in a Hoysala style temple: the large decorative domed roof over the tower; the kalasha on top of it (the decorative water-pot at the apex of the dome); and the Hoysala crest (emblem of the Hoysala warrior stabbing a lion) over the sukhanasi (tower over the vestibule).

Sunday, February 28, 2016

History beneath Jaipur

History beneath Jaipur

When surveys showed two ancient water tanks buried under a planned section of Metro rail in Jaipur, the government worked quickly to preserve and incorporate them into the overall design

For a hundred years, the people of Jaipur had no clue about what lay right beneath their homes. Until last year the Rajasthan government launched its Rs. 3,149 crore Phase I of the Jaipur Metro. As the government made preparations to dismantle two roundabouts in the heart of the city, Choti and Badi Chaupar on the Chandpole-Surajpole stretch, ground surveys indicated that underneath lay buried two nearly 250-year-old bavdis or kunds (tanks) that once brought water to the city centre from the surrounding Aravalli Hills.

The kunds were right in the path of the 12.06 km Mansarovar to Badi Chaupar metro line. The rail portion between Chandpole and Badi Chaupar had been planned as an underground section to protect several heritage monuments in the area. As debates raged about how to proceed after the discovery of the kunds, Rajasthan Chief Minister Vasundhara Raje Scindia asked the Jaipur Metro Rail and the Delhi Metro Rail Corporation officials to alter the design, if required, but to protect the heritage structures at any cost.

The Rajasthan government engaged the services of leading Mumbai-based conservation architect Abha Narain Lambah to map the heritage structures and old buildings. “We convinced people that proven technology, which has been used in fragile areas the world over, would be used and no harm would come to any of the monuments,” says Nihal Chand Goel, CMD, Jaipur Metro Rail Corporation.

“Mr. Goel has a strong connection with Jaipur, and he said there are old photographs of Jaipur taken around this area. We began researching, and found pictures shot by Lala Deen Dayal in the 1890s, which showed the two chaupars,” says Lambah.

Two retired Archaeological Survey of India officials joined Lambah’s team of conservation architects and excavations began in August 2014. “Nobody living knew about these kunds. Around the 1870s, when piped water supply arrived, people were apprehensive and the then ruler of Jaipur had to convince his people that piped water was not bad. The water tanks then slowly became redundant; they were filled with earth and converted into places of beauty and recreation,” says Goel. Later, when Prince Albert painted the city pink, gardens were built around the tanks, which gradually transformed into one of the most congested traffic circles in the old city.

The square kunds had eleven steps and tunnels entering them from four sides, with water bubbling out of beautifully carved marble gaumukhs. “It was a total surprise for us to find the kunds, made of stone masonry, completely intact. We have now mapped and numbered each stone and gaumukh. Everything has been preserved at the government-run Albert Hall until the metro project is complete. We will then restore it all as it was originally,” says Lambah.

According to her team’s research, the tanks brought water from the Aravalli Hills through tunnels into the city centre. The tunnels run along long lengths of Jaipur city and probably connected to the Jal Mahal or Talkatora reservoirs. The teams found them to be well-preserved with arched masonry and lime plaster-lined walls of 500 mm thickness, and large enough for a man to pass through.

Says Lambah, “There is an ancient Persian system of Qanats, an elaborate tunnel network, used for irrigation where there was no surface water. The archaeologists also found material from Bikaner archives that showed that even pitrupaksha rituals were performed in these kunds; like the Banganga tank in Mumbai. Where else will the poor go for water?”

To preserve the tanks, the Jaipur Metro Rail Corporation has altered its design. “We lowered the railway tracks by about one metre and make incidental design changes to accommodate the tanks above the metro stations at Choti and Badi Chaupar,” says Goel. He talks of how people often see development and heritage as two opposing things. “There is no dichotomy; both can co-exist and work with each other. The metro rail rejuvenates the city, and we can also restore a lost chapter of history which becomes a tourist attraction.”

Lambah visited several metro stations, including at Athens and Lisbon, where the developers have used heritage buildings discovered during excavations as part of the railway system. “Lisbon metro station is located in an old heritage building. You come out of the station and you are in a heritage building, with a Starbucks coffee shop, escalators and ticketing,” she says.

The Athens model was chosen for Jaipur. “In Athens, it is open to the sky. It doesn’t rain too much in Jaipur. So we decided to have a sandstone railing as enclosure and keep the station open-air. In Athens, they found 2,000-year-old ruins and they put a glass wall to protect it and made a museum out of it,” she says.

The Rajasthan government plans to set up a museum in the underground station area and use the tunnel heads to let people walk into the tanks. It is also thinking of converting the surface into a pedestrian urban plaza in the evenings, where arts and crafts can be displayed. When completed, this could become a model project for other parts of India on heritage preservation during development.

Sri Kodanda Rama Temple Gollala Mamidada


Sri Kodanda Rama Temple Gollala Mamidada

Sri Kodanda Rama Temple that is found at Gollala Mamidada village in East Godavari district. Sri Rama Navami festival. The Gollala Mamidada Temple homes the deities of Lord Rama, Mother Sita and Lakshmana. The Gollala Mamidada Temple has a powerful Gopuram that is at a height of over 170 feet.

Gollala Mamidada may be a well-known place within the district wherever Srirama Navami is celebrated in a very grand manner. The temple was built in 1889 by Dwarampudi Subbi Reddy and Rama Reddy.Celestial wedding of Lord Rama and Sita are performed at the temple on April a grand scale. The Kalyanam attracts thousands of devotees as Gollala Mamidada is additionally called Chinna Bhadradi.

The nine-day celebrations can begin on Apr 19, in keeping with temple authorities. Elaborate arrangements are created for the devotees to safeguard them from hot summer heat. Notably, Ms Dwarampudi Mahalakshmi is that the acting hereditary trustee of temple.

The marriage of Sita and Rama will begin at twelve hour followed by chariot procession and different ceremonies.

The Kalyanam here is fashionable once Bhadrachalam Kalyanam. Hence, various devotees throng the temple to witness the celestial wedding.

The speciality of the competition is that the celebration of ‘Ooyala Seva’ and ‘Sri Pushpa Yagam,’ which is able to be conducted on a grand note.

The Kalyanam are performed under the management of temple main clergymen Rejeti Venkat Kurma Ranganathacharyulu, Rejeti Narsimhacharyulu and Ponduru Satyanaranacharyulu of Kakinada Notably, the devotees believe that their needs would be consummated if they witness the Kalyanam and childless couples would sire children. Similarly, the devotees assume that it’s an honest omen to consume the sweet delicacy (Paayasam) created with talambralu used for Lord’s Kalyanam